समझी ?












ना तो तुम ज़न्नत की हूर हो ,
 ना ही कहीं की नूर हो
ना तो छायी हो ज़माने के दिलों  पे
ना ही लाखों का सुरूर हो
अरे तुम जैसी लाखों पड़ी हैं यहां , पर
हाय रे करम , तुम ही  मेरा गुरूर हो ।।

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