बदलते जमाने कि तस्वीर देखता हूँ
किस तरह हवाओं ने दर्द को
दिल से लगा लिया
किस तरह मुकम्मल है
धड़कन चोटों के साथ
मैं देखता हूँ हर रोज
बेचैनी की भीड़ ,
भीड़ में तैरती मायूसी की पीर देखता हूँ
मैं बदलते जमाने की तस्वीर देखता हूँ
मैं तंग आ गया हूँ सच में
इस मतलब के संसार से
घुटता रहता है दम मेरा
इस झूठ मूठ के प्यार से
पर जीना भी है मरे बिना
सोच यही रोज 'अमिष'
भागमभागी जग में लुटता धीर देखता हूँ
मैं बदलते जमाने की तस्वीर देखता हूँ
मैं देखता हूँ
इंसानों के हैवानी कारनामे ,
अपनों को लूटती
अपनों कि ख्वाहिशें ,
चरमराती मानसिकता
और गुमशुदा सोच
दुष्ट बादलों में बंधी व्याकुला ,
मानवता रूपी नीर देखता हूँ
मैं बदलते जमाने की तस्वीर देखता हूँ

sunder rachna hai Amish!
ReplyDeletekhaas taur par jis tarah swarthi sansar se aahat hone ki bhavnayein ubhari hain, bohot achchha laga...
tumhari vocab me variety hai, jo ki chaar chand laga deti hai...
shubhkamnayein!!!
ummeed hai aage aisi achchhi rachnayein dekhen ko milti rahengi...:)