काश कहीं से पाँव मिल जाये ...

















पता नहीं क्या हो रहा है आज कल
हमे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा
अभी कल तक सब तो थे साथ में ,फिर
आज ना जाने क्यूँ दूरियां आ गयीं
अभी कल ही तो किये थे मिलकर सबने वादे
कभी ना छूटेंगे ,ऐसे थे इरादे
अब ना जाने क्या हो गया उन वादों को ,उन इरादों को
सब कहते हैं आशावादी बनो
पर हमे आशा की आशा तो दिखे ?
सब कहते हैं "चलता है "
पर क्या और कैसे ? ऐसे ?
ये कोई नही बताता .
सब कहते हैं किस्मत का खेल है
पर हम क्या उस बिसात के माहिर मुहरे हैं ,जो
हर बार शहादत , नहीं -नहीं लगभग शहादत को पाते हैं
अब एक रास्ता ही है हमारे पास इस तंगी से बचने का
काश कहीं से इस पंख कटे को पाँव मिल जाए
ये उड़ तो कभी नहीं सकता ,
पर शायद घिसट -घिसटकर मौत की बाकी किश्तें पूरी कर जाए
काश कहीं से पाँव मिल जाये .....

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