और डोर टूट गयी ...........


सींचा था आस से , 
प्यार से विश्वास से।
कि नई कोपलें आएंगी,
जीवन को मेहकाएंगी।

तेरी छाँव में बैठूँगा,
तुमसे बात करुँगा ।
तेरे साये में झूमूँगा ,
अट्ठाहास करूँगा ।।

जग के बंधन की आँधी,
मेरे पौधे को तोड़ गई।
झड़ गयी वादों की कलियाँ,
आँधी बस यादें छोड़ गई ।।

खुशनुमा कल की साथी,
अचानक हमसे रूठ  गयी।
बंधी थी डोर जो प्रीत की,
एक ही झटके में टूट गयी ।।

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