हे गुरु मेरे ,मात पितु ......


मैं क्या देखूँ बताया तुमने 
मैं क्या बोलूँ सिखाया तुमने 
मैं क्या करूँ समझाया तुमने 
मुझे मुझसा बनाया तुमने 

आज भी याद है ,वो पहला दिन स्कूल का
वो पहली फटकार, फिर थोड़ी सी पुचकार
याद है वो 'ग' से गमला, 'प' से पतंग
याद हैं आज भी बचपन के वो सारे रंग

तुम ही हो जिसने बनाया मुझे 
तुम ही हो जिसने सपने दिखाए 
तुम्हारी ही बातें बिठाके मन में
सपने हमारे उड़ान पाए 

गुरु -ऋण- मुक्ति ना पाया कोई 
मैं अबोध क्या कर पाउँगा 
मैं चरणों का दास तुम्हारे 
नित तुमको शीश नवाऊंगा

हे गुरु मेरे ,मात पितु  
मेरा वंदन स्वीकार करो 
ज्ञानमयी आशीष  वृष्टि 
मुझपर बारम्बार करो ..



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