फिर क्यूँ जीना यूँ ????

बदले हुए मंजर ,
खफा खफा सी हवाएं ,
दिन रात लगातार
बरकरार जलन
अपनों को याद कर
तडपता मन
हर अजनबी में अपनों को खोजती निगाहें
भागती हुई मायूस सी राहें
पूछ रहा हूँ खुद से के मैं यहाँ क्यूँ ?
के जब मन नही मेरा, कोई नहीं मेरा

फिर क्यूँ जीना यूँ ???? 

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