अपेक्षा और विश्वास की गुत्थी.......

अपेक्षा और विश्वास में बस नाममात्र का अंतर होता है | एक ओर जहाँ अपेक्षा व्यक्ति की परो-निर्भरता को बताता है वहीँ दूसरीओर विश्वास कमजोर मनुष्य की निरान्ध श्रद्धा की अभिव्यक्ति करता है। ये बस हमारे तात्कालिक विवेक की क्षमता का परिणाम मात्र है जो हमें इन दोनों में से किसी एक का चयन करने के लिए बाध्य करता है , हाँ वो अलग बात है कि हमारे पास अपने इस चयन का एक कारण होता है जिसका हमारे मन में एक अकाट्य प्रेरणापुंज होता है जो बहुत कठिनाई से विचलित होता है और यदि किसी कारणवश वह विचलित भी हो जाये तो वो हमारे चयन को समाप्त नहीं करता अपितु केवल चयनान्तरित करता है।

ऐसी स्थिति में स्वयं को इन दोनों चयनों से परे रखना नितांत दुष्कर है परंतु यदि हम सहजता से दैनिक गतिविधियों तथा मनोभावों को संतुलित करें तो निश्चय ही दुःख के अनेक पलों से कहीं दूर एक दृढ़ता का अपने अंतस में वास करा सकते हैं।

निर्णय की यह विडम्बना सिर्फ अपेक्षा या विश्वास के चयन तक ही सीमित नहीं रहती अपितु हमारे क्रियाकलापों पर भी गहरा छाप छोड़ जाती है । एक सिद्धान्त है जीवन का- प्राथमिकता का सिद्धान्त । हमारे जीवन का हर एक निर्णय इसी सिद्धांत पर आधारित होता है । हम प्रायः यह उलाहना देते हैं कि अमुक व्यक्ति ने हमें या हमारी परिस्थितियों को नहीं समझा या उसने हमारा साथ नहीं दिया परन्तु कदाचित इस तथ्य पर विचार नहीं करते कि उसने ऐसा क्यों किया ? और यहाँ उद्भाव होता है प्राथमिकता के सिद्धान्त का। प्राथमिकता का सिद्धान्त कहता है कि किसी भी व्यक्ति द्वारा लिया गया निर्णय उस समय उस व्यक्ति के मस्तिष्क एवं हृदय में 'केवल' सर्वोपरि वरीयता वाले व्यक्ति, घटना अथवा विचार से 'ही' सम्बंधित होता है । और ऐसे में इस बात से उस व्यक्ति के निर्णय पर कोई असर नहीं पड़ता की आप या किसी अन्य व्यक्ति की आवश्यकता क्या है और उस आवश्यकता की अनिवार्यता क्या है ? और ऐसा केवल इसी नाते होता है क्योंकि कर्ता की प्राथमिकता कर्म की अभिलाषा या प्रतीक्षा करने वाले से प्रायः भिन्न होती है और इसी कारण उलाहना या खिन्नता की स्थिति उत्पन्न होती है ; यदि किसी कारणवश कर्ता की प्राथमिकता और कर्माभिप्सित व्यक्ति की आवश्यकता एक हो जाती है तो हम कर्ता को शुभेच्छु , सुमानव, श्रेष्ठ या कई बार अवतार जैसी संज्ञाओं से अलंकृत करते हुए जीवन पर्यन्त अपनी कृतज्ञता अर्पित करते रहते हैं ।

Comments