स्वप्न-देश के स्वप्न-पुरी के स्वप्न-भवन की रानी वो ।
वैसे तो मिलती है डेली फ़िर भी लगती अन्जानी वो ॥
एक तमन्ना ही रखतें हैं स्वप्न-देश के पंछी सारे ,
बनकर मोती मैं भी तैरुं ,कजरारे उन झील किनारे ;
उसकी आहट से हिलते हैं ,स्वप्न-बाग के पात पियारे ,
खिलकर उसकी पालकों पर इतरातें हैं फूल नियारे ;
खूब सताती खूब रिझाती मेरे मन की रानी वो ।
वैसे तो मिलती है डेली फ़िर भी लगती अन्जानी वो ॥
उसकी नटखट हलचल से मधुवर्षा होती है रिमझिम,
खुद को उसका प्रेमी कहता ,सूरज भी होकर के मद्धिम;
मामा चन्दा भी आशिक हैं ,उन मतवाली चालों के ,
बदन लचीले नयन कटीले ,घुँघराले बालों के ;
न रुकती ,जब भी मैं कहता ,करती अपनी मनमानी वो ।
केवल आँखों से मुस्का ही ,चल देती मेरी रानी वो ।
वैसे तो मिलती है डेली फ़िर भी लगती अन्जानी वो ॥
स्वप्न-देश के स्वप्न-पुरी के स्वप्न-भवन की रानी वो ।
वैसे तो मिलती है डेली फ़िर भी लगती अन्जानी वो ॥
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