जीता था सपनों में केवल
वह सच से अंजाना था ।
रहता मजलिस में, पर उसने
'उसका' चेहरा ही जाना था ।।
पलकों में पाला था उसने
दो ही लोगों का ज़माना था
अरमां उसके ताज़े थे, हां
मकां भले पुराना था ।।
घर ना लौटेगा आशिक़ वह
उसने भी मन में ठाना था।
यादों में जी लेगा 'उसकी',
वो जैसा भी अफ़साना था ।।
Comments
Post a Comment