तारों की चमचम में चन्दा ने,
सोने की धार बहायी थी ।
दिन भर धूप से झुलसी धरती ,
स्वर्णिम जल से नहायी थी ॥
इसी बीच एक तारा टूटा ,
दिखी आसमां में इक धार ।
सोने के घर में खींच उठी ,
चाँदी की लम्बी सी दरार ॥
इस दरार से निकल पड़ी थी ,
इक रजत रश्मि की बरसात ।
स्वर्णिमा के आँगन में घुस मानो ,
दी रजत ने थी उसको ही मात ॥
पर श्वेता नीरा सदृशा यूं ,
ऐसा भी क्या बरस रहा था ?
घण्टों से देख रहा था अपलक ,
मैं 'और देखना' कह तरस रहा था ॥
चाँदी की इस वर्षा में,
आनन्दित आंखें थीं तत्पर ।
पर वे अब अचरज में आयीं ,
देख युगल उज्ज्वल सा पर ॥
अब चाँदी कुछ हल्की थी,
पर उज्जवलता भारी ।
श्वेता वसना गौर-वर्णिमा ,
इक दिखन लगी थी नारी ॥
श्वेत सुमन सज्जित नारी की ,
जब देखा अनुपम भंगिमा ।
मुदित हुई आँखों ने पूछा ;
"तुम कौन सुन्दरी मधुरिमा ?"
सुरभित वचनों में वह बोली,
"मन के रंगों से गयी उकेरी ।
मैं प्रेम-लोक की 'अल्पना' हूँ ,
नयनों को शीतल करने आयी ,
मैं तेरी ही इक 'कल्पना' हूँ ॥"
सहसा हो जागा ,मैं उठ बैठा ;
देखा नभ में कई बार ।
पर ना पाया मैं श्वेता -वसना ,
ना पाया चांदी की धार ॥
मैं जो चन्दा मामा के संग,
था हर्षित पुलकित आवारा सा ।
सूरज के घाटी में आने पर ,
दिख रहा था विह्वल हारा सा ॥
वह श्वेता रंगों वाली जो ,
आयी थी मिलने अल्पना ।
चिन्तित मन मेरा पूछ पड़ा ,
"क्या वो मेरी ही थी कल्पना ?"
सोने की धार बहायी थी ।
दिन भर धूप से झुलसी धरती ,
स्वर्णिम जल से नहायी थी ॥
इसी बीच एक तारा टूटा ,
दिखी आसमां में इक धार ।
सोने के घर में खींच उठी ,
चाँदी की लम्बी सी दरार ॥
इस दरार से निकल पड़ी थी ,
इक रजत रश्मि की बरसात ।
स्वर्णिमा के आँगन में घुस मानो ,
दी रजत ने थी उसको ही मात ॥
पर श्वेता नीरा सदृशा यूं ,
ऐसा भी क्या बरस रहा था ?
घण्टों से देख रहा था अपलक ,
मैं 'और देखना' कह तरस रहा था ॥
चाँदी की इस वर्षा में,
आनन्दित आंखें थीं तत्पर ।
पर वे अब अचरज में आयीं ,
देख युगल उज्ज्वल सा पर ॥
अब चाँदी कुछ हल्की थी,
पर उज्जवलता भारी ।
श्वेता वसना गौर-वर्णिमा ,
इक दिखन लगी थी नारी ॥
श्वेत सुमन सज्जित नारी की ,
जब देखा अनुपम भंगिमा ।
मुदित हुई आँखों ने पूछा ;
"तुम कौन सुन्दरी मधुरिमा ?"
सुरभित वचनों में वह बोली,
"मन के रंगों से गयी उकेरी ।
मैं प्रेम-लोक की 'अल्पना' हूँ ,
नयनों को शीतल करने आयी ,
मैं तेरी ही इक 'कल्पना' हूँ ॥"
सहसा हो जागा ,मैं उठ बैठा ;
देखा नभ में कई बार ।
पर ना पाया मैं श्वेता -वसना ,
ना पाया चांदी की धार ॥
मैं जो चन्दा मामा के संग,
था हर्षित पुलकित आवारा सा ।
सूरज के घाटी में आने पर ,
दिख रहा था विह्वल हारा सा ॥
वह श्वेता रंगों वाली जो ,
आयी थी मिलने अल्पना ।
चिन्तित मन मेरा पूछ पड़ा ,
"क्या वो मेरी ही थी कल्पना ?"
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