तुम

तुम ही राम हो तुम ही रहीम,
हो तुम ही मेरा गुरुद्वारा ।
तुम ही हो सूरज तुम ही चंद्रमा
हो तुम ही मेरा हर तारा ।।

मेरे हर आंसू में बनता
तेरा बिम्ब, तेरी ही छाया ।
हर राग पे झूमे नृत्य करे
तेरा मन और मेरी काया ।।

जब भी मन जाता अतीत में
रोमांचित हो जाता हूँ मैं ।
फिर से खिल जाता हूँ अति
अभिसिंचित हो जाता हूँ मैं ।।

स्पर्श तुम्हारा प्रिये मुझे
दिव्य आभास कराता है ।
व्यथित हुए ह्रदय में आकर
सुन्दर परिहास कराता है ।।

मेरा मन एक फुलवारी तो
तुम उसकी शोभा रही सुमन ।
जब मैं मृग बन अटखेल किया
तुम बन जाती थी सुन्दर वन ।।



इस खेल खेल में पाया मैंने
कुछ वर्षों में युग सा जीवन ।।
नेह प्रेरणा का संगम
एक मित्र और पावन मन ।।

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