ये बादल बड़ा तंग करते हैं मुझे,
मुझे देख मुझपे गरजते हैं ।
एक जुट हो ढेर सारे, डराते हैं मुझे
फिर मुझसे डर कर खामखाँ बिखरते हैं ।।
कभी साफ़ पाक़ बनकर
मेरे करीब आ जाते हैं
कभी उड़ उड़ कर हवा में
मुझे नीचा दिखा जाते हैं ।।
पसंद नहीं है बचपन से मुझे
फ़ालतू सी बात पे इतराना किसी का ।
मंडराना बेवजह सर के ऊपर
तंग कर , मन मार जाना किसी का ।।
पर कहानी ख़तम होती न यहाँ पर गुस्ताख़ की
ये बेअदब मुझे जलील करता है ।
मुझे देख के चमकता है , ठहरता है
बात बात पर हरकत-ए-कलील करता है ।।
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