मैं रह रह के काँप रहा था
तपिश बढ़ती जा रही थी
अजब सी बेचैनी हो रही थी
आँखें जल रही थीं
धड़कन भी बढ़ रही थी
डर था डेंगू का , लेकिन
वजह कुछ और ही थी
ये बुखार नहीं, खुमार था
'डर का खुमार' ! क्योंकि;
वो आ रहा था, जिसने
मुझे जवान किया था
'टीन एज' पार कराकर
मुझे अरमान दिया था
मुझे थोड़ा सा ज्ञान,
थोड़ा सम्मान दिया था
दिया था मुझे नज़रिया
नज़र, नीयत, वायदा और
जीने का एक मक़ाम दिया था
उसे सोच लेने भर से, मैं
अक्सर हिल जाता था,
और आज ?
आज तो वो खुद आने को था
वो , जो अब मेरा नहीं है,
ना ही अब होगा कभी
बस उसके अलावा हर कोई
साथ मेरे है आज भी
पर क्या करूँ ,
कर क्या सकता था
यही सोच कर
खुमार में तड़पता था
लो, वो आ गया ;
आखिर आ गया वो...
'बरेली शहर' ।

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