जाने क्यों दूर हो गया हूँ ...















रोकता है हर बार,
खींचता है जोर से
बोलता है न जा रे,
फिर से मुझे छोड़ के ।।

देता है वास्ता वो,
बचपन का प्यार का ।
मिट्टी से सन के बीता,
जो वक़्त वो दुलार का ।

नाराज़गी तो देखो उसकी!
उसने मुझे सयाना कहा,
कहीं और का 'बसिन्दा'
और बड़ा मनमाना कहा ।।

मुड़ के फिर ठहर वहाँ ,
मैंने समझाया उसे प्यार से ।
आँखें मेरी भी भर आईं ,
उसी अपनेपन-दुलार से ।।

उसका ही था, हूँ आज भी
कह, फिर उसे समझाया ।
'अब आऊँगा, न जाऊँगा' का
आस वाला ख़्वाब दिखाया ।।

बस , इतना ही कह पाया,
उस गाँव, सड़क मकान से ।
पाला है जिसने मुझे बड़े,
प्यार, अपनेपन, दुलार से ।।

कैसे बताऊँ और किसे,
कि मन में मेरे क्या है ?
क्या मकसद है मेरा सच में,
कि अरमान मेरे क्या हैं ?

कि थोड़ा और छोटा,थोड़ा
और मजबूर हो गया हूँ ,
चाहूँ यहीं रहना,फिर भी
जाने क्यों दूर हो गया हूँ।

Comments