लक्ष्य विजय मस्तिष्क पटल पर
अब स्थिर उद्वेलित मन ,
ध्येय सफलता , निरत साधना
से सुरभित है अन्तस वन।
अब नदियों का कल-कल मधुरिम है
है मधुरिम खग का प्रात- आह्वान ,
अब हर अवयव इस जगती के
कानों में गाते उन्नति गान।
अब दिन-प्रति नव है , मन क्रेन्द्रित
ऊर्जा वाहक मानस आलोक ,
दिव्य रवि के सकल अंशु-गण
नित हरते आलस मन का शोक।
मन्द पवन में वेग लक्ष्य का
विश्वास भरी शीतलता है ,
कण्टक -कष्टक राहों में अब
प्रेरणास्पद कोमलता है।
आशावादी हो चला है मन
अब गुण ही दिखते जन मन में ,
जागृति की सुरभि विसरित होती
मेरे स्थिर मन तन में।

Comments
Post a Comment