तुम मेरा अभिमान हो














चंचल मन में नित प्रति आती
भावों की सुन्दर वेला हो तुम ।
अंतस -जग में उल्लास दिलाती
स्वप्नों-नेहों का मेला हो तुम ।।

जब होती मेरे निकट कहीं तुम
मैं आभूषित हो जाता हूँ ।
अर्ध चंद्र सा रहूँ मगर तब ,
अतुलित, पूरित हो जाता हूँ ।।

तुम घोर निशा में इस अवनी को
नित करती आभामान हो ।
तुम गंगा जैसी उज्जवल नीरा
प्रिय ! तुम मेरा अभिमान हो ।।

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