वर्षा















उमड़ते थे मेघ नभ में,
क्या खूब मजा प्रिय आता था !
अपने हाथों का पंख बना,
मैं भी चिड़ियों संग गाता था ।।
सावन की बारिश से जब,
बेलें चढ़ फैल सवंरती थीं ।
सुर में सुर जब डाल प्रीत के
कजरी की तान बिखरती थीं ।
जब जल का चुम्बन पा भू से,
सोंधी सी खुशबू आती थी ।
जब शीतल नम और मंद वायु,
अंतर - मन छू जाती थी ।।
जब वर्षा इक ऋतु होती थी
मिलन, खेल और प्यार की।
आंखों को शीतल करती थी
नित हरियाली संसार की।
अब कहाँ गयी वह वर्षा जाने!
कहाँ गए वो मेघ घने !
कहाँ खो गयी सोंधी खुशबू !
बेलों से सज्जित हरे तने !
यादों में रह गयी है कजरी
यादों में अनवरत बरसना।
'आज' शुष्क है, है गर्म बहुत
है वर्षा हेतु रोज़ तरसना।।

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