सफ़र ट्रेन का













उसकी आँखों का तेज, जब
मेरे नयनों से टकराया
क्षणिक सही, किन्तु पटल पर,
पूरा भाव उतर आया ।
पाया जब मैं 'पूर्ण भाव'
थोड़ा सोचा, फिर मुस्काया
पुनः सहज हो पाने हेतु,
खिड़की के बाहर नज़र घुमाया
किन्तु पुनः, वही तेज जब
निस्तेज दृगों से टकराया,
स्थिर कर अपने अक्ष अमिष मैं,
आभा के शशि का दर्शन पाया
मैं अब शीतल होकर उन,
शीतल नयनों का संदेसा पाया,
खुद को दृढ़ और अधिक कर, मैं
दृष्टि-नेह-पत्र भिजवाया
मेरा अनुनय निश्छल है, निश्चय
प्रतिउत्तर पाउँगा मैं
इस कृष्ण निशा में आज अमिष
उज्ज्वल शीतल हो जाऊंगा मैं
वो शशि मेरे ऊपर है, अब
मैं नीचे उसके लेटा हूँ
उस प्रथम तड़ित की ज्वाला का
पूरा तेज़ समेटा हूँ
रेलवे की चादरों से अब
जब जब चाँद निहार रहा
अपने भावुक नयनों से मैं
उसका तेज संवार रहा

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