अकल्पित नाते















मेरी जीवन बगिया में,
आते रहे कुछ फूल,
कुछ काँटे ,
कुछ वीरानियां,
कुछ मुलाकातें ,
तपिश से भरे
जले हुए दिन
करवटों में कटीं
उलझनी रातें ।
उन दिनों बहुत याद आये
मेरे मुँहबोले खास
याद आये उनके वादे
और  मुँहबोली बातें ।
परिचित की आस में
मिले गैरों के एहसान,
टूटे मन को जोड़ दिए
कई अकल्पित  नाते ।

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