बादल













ये बादल बड़ा तंग करता है मुझे,
मुझे देखकर मुझपे गरजता है;
एक जुट होकर, डराता है मुझे
फिर मुझसे ही डरकर बिखरता है ।।
कभी साफ़ पाक़ बनकर,
मेरे करीब आ जाता है।
कभी उड़ उड़ कर हवा में,
मुझे नीचा दिखा जाता है।।
पसंद नहीं है बचपन से मुझे,
फालतू सी बात पे इतराना किसी का ।
मंडराना बेवजह सर के ऊपर,
तंग कर , मन मार जाना किसी का ।।
पर कहानी ख़तम होती न यहाँ,
ये बेअदब मुझे ज़लील करता है ।
मुझे देख के चमकता है , ठहरता है,
बात बात पर हरक़त-ए-क़लील करता है ।।

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