टूटा है विश्वास हृदय का,
मन भी मेरा शांत नहीं है ।
है विचलित ये, कष्टित भी
जीवन में एकांत नहीं है ।।
जीवन के इस दीये में,
जो संबंधो की बाती है ।
ईर्ष्या के घी की बूँदों में वह
जल-जलकर बुझ जाती है। ।
है अंधकार चहुँओर मेरे,
रवि आशाओं का अस्त है ।
जो कोई अपना था कल तक,
अब आप में ही में व्यस्त है ।।
मिथ्या करुणा की ज्वाला में,
नित ही अब जलना होगा ।।
जीवन के इस दुष्कर पथ पर,
मुझको एकल चलना होगा ।।

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