Posts

सीमा-प्रहरी वीरों को

स्थिर मन

तुम मेरा अभिमान हो

एक हथेली धूप

जियूँ 'मैं' सौ साल

रोशनी

मैं रहूँ, न रहूँ

मन के जन को धुनता हूँ

जाने क्यों दूर हो गया हूँ ...

जताना तो पड़ेगा ही

आखिर आ ही गया वो ...