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सीमा-प्रहरी वीरों को

स्थिर मन

तुम मेरा अभिमान हो

एक हथेली धूप

जियूँ 'मैं' सौ साल

रोशनी

मैं रहूँ, न रहूँ

मन के जन को धुनता हूँ

जाने क्यों दूर हो गया हूँ ...

जताना तो पड़ेगा ही

आखिर आ ही गया वो ...

इत्तेफ़ाक़

ख़ुदग़र्ज़

समझी ?

इति सत्यं

ख़ामोश .........

Good Morning

ना तुम्हारा ना हमारा

गुस्ताख़